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Venu Geet (Swami Shri Akhandanand Saraswati)
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वेणुगीत स्वामी श्री अखंडानंद सरस्वती जी द्वारा रचित श्रीमद्भागवत महापुराण के मधुर अंश का एक सजीव स्वादेन्द्रिय ग्रंथ है। इसमें वर्णित है कि जैसे गोपियाँ अपने हृदय में कृष्णनाम का गोपन कर बाँसुरी (वेणु) के माध्यम से क्रियाशील कर लेती हैं, वैसा ही यह गीत भी गोपियों द्वारा रचित और कृष्णस्वरचित अमृतसमभाव गीत है। यह वेणुगीत कोई केवल काव्यात्मक संकलन नहीं, बल्कि गोपी–भक्ति की उस गुप्त प्रक्रिया का चित्रण है, जिसमें प्रेमी अपने हृदय का रहस्य छुपाकर ईश्वर की ओर अनन्य भाव से स्मरण करता है। स्वामी अखंडानंद जी की सरल और रसपूर्ण भाषा इस ग्रंथ को हृदयस्पर्शी बनाती है। वेणुगीत में निहित गोपी–गीत, भक्ति–गीत और कृष्ण–गीत के स्वरूपों का गूढ़ विवेचन करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि प्रेम की यह लीलामयी अभिव्यक्ति भक्त को दिव्य अनुभूति की ऊँचाइयों पर ले जाती है। पाठक जब इस वेणुगीत के रस में लीन होता है, तो मुरली की मधुर ध्वनि से उत्पन्न प्रेम–वेदना और आत्मसमर्पण की अनुभूति स्वयं उसके हृदय में जाग उठती है।
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