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Vo Param Satya
Vo Param Satya
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“वो परम सत्य” जैसा कि इस पुस्तक के नाम से ही विदित होता है, कि ये पाठक के भीतर उत्पन्न करती है एक कुतूहल, एक जिज्ञासा उस परम सत्य को जानने की। वो परम सत्य में भी 'वो' शब्द अत्यंत गूढ़ रहस्यों से भरा है। 'वो' कहकर पुस्तक की लेखिका मानो एक ओर तो निश्चयात्मक शैली में इंगित सी करती दिखती है कि 'लो, ऐसा है परम सत्य' पर वहीं दूसरी ओर मानो इसी 'वो' की व्याख्या करती हुई वह एक रहस्यमयी पेचीदगी में भी ढकेलती जाती है। हो सकता है पुस्तक को आद्योपांत पढ़ने के बाद, पाठक एक बार यह सोचे कि विदुषी लेखिका आखिर समझाना क्या चाहती किंतु समाहित चित्त से पढ़ने के बाद आपको ज्ञात होगा कि वस्तुतः लेखिका बड़ी रहस्यमयी शैली का प्रयोग कर विज्ञान से वेदांत तक के प्रमाणों का आश्रय लेती हुई, आपकी बुद्धि को जानबूझकर एक पहेली को स्वयं सुलझाने की ओर प्रेरित करती है। वस्तुतः ये इतना सरल नहीं है कि मानव मस्तिष्क में उठते हुए इन अनादि प्रश्नों का उत्तर एक पुस्तक से दिया जा सके फिर भी लेखिका का यह प्रयास अद्भुत और प्रशंसनीय है।
पुस्तक में विश्व विख्यात आधुनिक वैज्ञानिकों की अवधारणाओं को उद्धृत करके जहाँ भौतिकतावाद के पक्षधर तार्किकों को तर्क से ही समुचित उत्तर देने का प्रयास हुआ है, वहीं दर्शनशास्त्र तथा वेद वेदांत के प्रमाण सोपानों पर आरोहण करवाते हुए पुस्तक ने आध्यात्मिक साधकों के भी अनेक जटिल अनुत्तरित प्रश्नों का समाधान भी दे दिया है। वैसे किसी तर्क से, उत्तर से, प्रमाण से सत्य समझ आ ही जाए यह आवश्यक नहीं है क्योंकि समझ का जन्म ही आपकी इस अत्यंत अल्प सामर्थ्य वाली बुद्धि से होता है जो यथार्थ सत्य को समझने में सर्वथा असमर्थ रहती है।
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